उत्तरकाशी का सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक पुराना नाम ‘बाड़ाहाट’ (Barahat) है। प्राचीन काल में यह शहर इसी नाम से जाना जाता था। ‘बाड़ाहाट’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है— ‘बाड़ा’ (बड़ा) और ‘हाट’ (बाज़ार)। पुराने समय में यह भारत और तिब्बत के बीच व्यापार का एक बहुत बड़ा केंद्र हुआ करता था, जहाँ ऊन, नमक और जड़ी-बूटियों का बड़े पैमाने पर व्यापार होता था। आज भी उत्तरकाशी की ‘नगर पालिका’ का आधिकारिक नाम ‘नगर पालिका परिषद बाड़ाहाट’ ही है, जो इसके गौरवशाली अतीत की याद दिलाता है।
ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार, बाड़ाहाट का महत्व केवल व्यापार तक सीमित नहीं था। स्कंद पुराण के ‘केदारखंड’ में इस क्षेत्र का विस्तार से वर्णन मिलता है। पुराणों में इसे ‘सौम्य काशी’ के नाम से भी संबोधित किया गया है। माना जाता है कि भगवान शिव यहाँ ‘सौम्य’ रूप में निवास करते हैं, इसलिए इसे ‘सौम्य काशी’ कहा गया। जैसे-जैसे समय बदला और वाराणसी (काशी) के साथ इसकी धार्मिक समानताएं (जैसे विश्वनाथ मंदिर और मणिकर्णिका घाट) अधिक प्रसिद्ध हुईं, इसका नाम धीरे-धीरे ‘बाड़ाहाट’ से बदलकर ‘उत्तरकाशी’ (उत्तर की काशी) पड़ गया।
इसके अलावा, कुछ ऐतिहासिक दस्तावेजों और लोक कथाओं में इसे ‘काशीराज’ और ‘शिवनगरी’ के रूप में भी जाना गया है। चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने भी अपने यात्रा वृत्तांतों में इस क्षेत्र का उल्लेख ‘ब्रह्मपुरा’ के एक हिस्से के रूप में किया है। उत्तरकाशी के विश्वनाथ मंदिर में स्थित प्राचीन ‘शक्ति स्तंभ’ (त्रिशूल) पर खुदे हुए शिलालेख भी इसके प्राचीन इतिहास की गवाही देते हैं। ‘बाड़ाहाट’ नाम आज भी यहाँ के प्रसिद्ध ‘माघ मेले’ में जीवित है, जिसे स्थानीय लोग ‘बाड़ाहाट का कौथिग’ (मेला) कहते हैं।
संक्षेप में, उत्तरकाशी का ‘बाड़ाहाट’ नाम यहाँ की आर्थिक समृद्धि का प्रतीक था, जबकि ‘उत्तरकाशी’ नाम इसकी आध्यात्मिक ऊंचाई को दर्शाता है। यदि आप आज उत्तरकाशी जाते हैं, तो आप शहर के आधुनिक स्वरूप के पीछे छिपे प्राचीन ‘बाड़ाहाट’ की झलक यहाँ के पुराने बाज़ारों और लोक संस्कृति में देख सकते हैं।
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